नौ साल की उम्र में एक बच्चे ने एक धुन बनाई थी। उस धुन को उसके पिता ने ले लिया, ज़रा सा बदला, और एक फ़िल्म में इस्तेमाल कर दिया। वो धुन थी "ऐ मेरी टोपी पलट के आ" — फ़िल्म थी "फंटूश", साल था 1956। वो बच्चा बड़ा होकर आर.डी. बर्मन बना, और उसके पिता थे संगीतकार एस.डी. बर्मन। ये शुरुआत ही बता देती है कि पंचम दा (जैसा उन्हें प्यार से बुलाया जाता था) की सोच बचपन से ही बाकी संगीतकारों से अलग थी। जहां उनके ज़माने के ज़्यादातर संगीतकार तबला, हारमोनियम, सितार जैसे परंपरागत साज़ों तक सीमित थे, वहीं आर.डी. बर्मन को हर आवाज़ में संगीत सुनाई देता था — चाहे वो कांच के गिलास पर उंगली फेरने की आवाज़ हो, या खाली बॉटल पर वार करने की। ## स्टूडियो में जो भी मिला, वो साज़ बन गया "महबूबा महबूबा" गाने में जो हैरतअंगेज़ लय है, वो बर्मन साहब ने माउथ ऑर्गन और अपनी ही आवाज़ से बनाई थी — गाना खुद गाया भी उन्होंने। "चुरा लिया है तुमने जो दिल को" में जो शुरुआती गिटार रिफ़ है, वो उस दौर के हिंदुस्तानी सिनेमा में लगभग किसी ने नहीं सुना था। पंचम दा पश्चिमी संगीत — जैज़, रॉक, लैटिन बीट्स — को उतनी ही सहजता से भारतीय धुनों में पिरो देते थे जितनी सहजता से कोई अपनी मातृभाषा बोलता है। एक किस्सा मशहूर है — "यादों की बारात" फ़िल्म के गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान स्टूडियो में सही ड्रम साउंड नहीं मिल रहा था। बर्मन साहब ने पानी से भरे मटकों पर वार करके वो आवाज़ निकलवाई जो उन्हें चाहिए थी। ऐसे किस्से उनकी पूरी ज़िंदगी में बिखरे पड़े हैं — क्योंकि उनके लिए संगीत किताबी नियमों से नहीं, बल्कि प्रयोग से बनता था। ## किशोर कुमार के साथ जो जोड़ी बनी आर.डी. बर्मन और किशोर कुमार की जोड़ी को समझे बिना 1970-80 के दशक के बॉलीवुड संगीत को समझना अधूरा है। दोनों लगभग हमउम्र थे, दोनों को जोखिम लेने से डर नहीं लगता था, और दोनों को पता था कि एक-दूसरे से क्या निकलवाया जा सकता है। "दम मारो दम" जैसे साइकेडेलिक, पश्चिमी असर वाले गाने से लेकर "रिमझिम गिरे सावन" जैसे नाज़ुक, शास्त्रीय झलक वाले गीत तक — इस जोड़ी ने वो सब किया, जो उस दौर में "मुख्यधारा" बॉलीवुड में करने की हिम्मत कम ही लोग करते थे। पर सिर्फ किशोर कुमार तक बात सीमित नहीं थी। आशा भोसले के साथ मिलकर उन्होंने "कतरा कतरा", "मेरा कुछ सामान" जैसे प्रयोगात्मक, गहरे गाने बनाए। यहां तक कि "1942: अ लव स्टोरी" (उनकी आखिरी फ़िल्मों में से एक) में भी उन्होंने साबित किया कि उम्र के आखिरी पड़ाव में भी उनकी धुनें उतनी ही ताज़ा और खूबसूरत हो सकती हैं। ## वो दौर जब उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया दिलचस्प बात ये है कि 80 के दशक के आख़िर में, जब डिस्को और सिंथेसाइज़र-हैवी संगीत का दौर आया, आर.डी. बर्मन को थोड़े समय के लिए फ़िल्म इंडस्ट्री ने लगभग भुला दिया था। कई प्रोड्यूसर उन्हें "पुराना" मानने लगे थे। लेकिन "1942: अ लव स्टोरी" के गानों ने साबित कर दिया कि उनकी प्रतिभा कभी बूढ़ी नहीं हुई थी — दुर्भाग्यवश, इस फ़िल्म की रिलीज़ से पहले ही उनका निधन हो गया, और उन्होंने कभी नहीं देखा कि ये फ़िल्म उनके करियर की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक बनेगी। ## सिर्फ फ़िल्मी गाने नहीं, बैकग्राउंड स्कोर भी बहुत कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि आर.डी. बर्मन सिर्फ गानों के लिए नहीं, बल्कि फ़िल्मों के बैकग्राउंड स्कोर के लिए भी उतने ही माहिर थे। "शोले" का बैकग्राउंड म्यूज़िक — वो तनाव भरा संगीत जो गब्बर सिंह के सीन में बजता है, या वो हल्का-फुल्का संगीत जो वीरू और बसंती के सीन में — ये सब पंचम दा की ही देन है। एक अच्छा बैकग्राउंड स्कोर अक्सर नज़र नहीं आता, लेकिन उसके बिना कोई भी सीन उतना असरदार नहीं लगता। यही अनदेखा काम था जिसमें आर.डी. बर्मन का कोई सानी नहीं था। उनकी एक और खासियत ये थी कि वो कोरस और बैकिंग वोकल्स के इस्तेमाल में भी नए प्रयोग करते थे। "ओ हंसिनी" जैसे गानों में जो लेयर्ड हार्मनी है, या "पिया तू अब तो आजा" में जो हॉर्न सेक्शन है — ये सब उस दौर के हिंदुस्तानी सिनेमा में एक नई भाषा गढ़ रहे थे, जो पश्चिमी बैंड साउंड से प्रेरित होकर भी पूरी तरह भारतीय महसूस होती थी। ## आज भी क्यों सुनाई देते हैं ये गाने Radio Hotstar पर जब हम पुराने गाने बजाते हैं, तो आर.डी. बर्मन का नाम शायद सबसे ज़्यादा बार आता है — भले ही श्रोताओं को हमेशा संगीतकार का नाम याद न हो, लेकिन जैसे ही धुन बजती है, पहचान तुरंत बन जाती है। ये उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी — उनका संगीत सिर्फ "सुनने" के लिए नहीं था, वो शरीर में उतर जाता था, नाचने पर मजबूर कर देता था, या कभी-कभी बहुत गहरे तक छू जाता था। अगली बार जब कोई पुराना गाना अचानक अपनी ताल से चौंका दे — बीच में कोई अनोखी सी आवाज़, कोई अनसुना सा वाद्य — तो समझ लीजिए, वहां पंचम दा का हाथ ज़रूर रहा होगा।