कभी-कभी लोग मुझसे पूछते हैं — "अब तो हर गाना यूट्यूब पर है, स्पॉटिफ़ाई पर प्लेलिस्ट बना सकते हो, फिर रेडियो सुनने की क्या ज़रूरत?" ये सवाल जायज़ है, और मैं झूठ नहीं बोलूंगा — कई बार मैं खुद भी यही सोचता हूं। लेकिन फिर हर शाम, जब मैं माइक ऑन करता हूं और शो शुरू होता है, कुछ ऐसा होता है जो प्लेलिस्ट में नहीं मिलता। फ़र्क बहुत सीधा है — प्लेलिस्ट आपको वो गाना देती है जो आपने पहले सुना है, या जो एल्गोरिद्म को लगता है आपको पसंद आएगा। रेडियो शो में एक इंसान होता है दूसरी तरफ़, जो उस वक़्त, उसी पल, आपके साथ बैठकर गाने चुन रहा है। जब कोई श्रोता मैसेज भेजता है — "भैया, आज मूड ठीक नहीं, कोई पुराना गाना बजा दीजिए" — तो मैं सच में उस मैसेज को पढ़कर, उस पल के हिसाब से एक गाना चुनता हूं। ये वो चीज़ है जो कोई भी एल्गोरिद्म नहीं कर सकता। ## हर शाम एक नया दिन होता है मेरा शो शाम 6 से 10 बजे तक चलता है, और हर दिन का मूड अलग होता है। सोमवार की शाम अक्सर थकी हुई होती है — लोग हफ़्ते की शुरुआत से जूझ रहे होते हैं। शुक्रवार बिल्कुल अलग एनर्जी लेकर आता है। मैं इन चीज़ों को महसूस करता हूं, और उसी हिसाब से गाने चुनता हूं। कोई प्लेलिस्ट ये नहीं समझ सकती कि आज सोमवार है और शायद लोगों को कुछ हल्का-फुल्का चाहिए। और सबसे ख़ास बात — जब कोई लिसनर मैसेज भेजता है, चाहे वो कोई गाना रिक्वेस्ट हो, कोई शाउटआउट हो, या सिर्फ "भैया आपका शो रोज़ सुनता हूं," तो वो सिर्फ एक मैसेज नहीं होता। वो एक कनेक्शन होता है। मैं शायद उस इंसान से कभी मिलूं भी नहीं, लेकिन उस पल हम दोनों एक ही गाना, एक ही एहसास शेयर कर रहे होते हैं। ## बिहार से पूरी दुनिया तक जब मैंने रेडियो होस्टार शुरू करने के बारे में सोचा था, तो सच कहूं तो मुझे नहीं पता था कि ये इतनी दूर तक पहुंचेगा। बरहरिया, सीवान जैसी जगह से शुरू हुआ ये स्टेशन आज देश-विदेश में सुना जाता है। और जो सबसे ज़्यादा सुकून देने वाली बात है, वो ये कि जो लोग अपने घर से दूर रहते हैं — चाहे किसी दूसरे शहर में हों या किसी दूसरे देश में — उनके लिए ये स्टेशन एक तरह से घर की याद बन जाता है। बिहार के गाने, अपनी भाषा में बात, वो अपनापन जो शायद बड़े शहरों के रेडियो स्टेशनों पर नहीं मिलता। ## वो मैसेज जो मुझे आज भी याद हैं कुछ महीने पहले एक श्रोता ने मैसेज भेजा था — बता रहे थे कि वो परदेस में काम करते हैं, अपने घरवालों से बहुत दूर, और रात की शिफ़्ट के बाद जब थके-हारे घर लौटते हैं तो हमारा शो लगा लेते हैं क्योंकि उसमें उन्हें अपनी भाषा, अपने गाने, और अपनापन मिलता है। ऐसे मैसेज पढ़कर लगता है कि हम सिर्फ गाने नहीं बजा रहे, हम किसी के लिए घर जैसा एहसास बना रहे हैं। एक और बात जो मुझे हमेशा अच्छी लगती है — जब कोई पुराना श्रोता किसी नए श्रोता को हमारे शो के बारे में बताता है, "अरे ये स्टेशन सुनो, बहुत अच्छा लगता है।" ये किसी विज्ञापन से नहीं होता, ये सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि किसी को हमारा शो सुनकर अच्छा महसूस हुआ, और वो चाहता है कि उसके अपनों को भी वही एहसास मिले। ## रेडियो में जो ज़िंदा-पन है स्पॉटिफ़ाई की प्लेलिस्ट परफ़ेक्ट होती है — कभी गलती नहीं होती, कभी गाना बीच में अटकता नहीं। लेकिन शायद यही परफ़ेक्शन उसकी कमी भी है। रेडियो में एक ज़िंदा-पन है, एक अनिश्चितता है — अगला गाना क्या बजेगा, ये आप नहीं जानते, मैं भी पूरी तरह नहीं जानता, क्योंकि कभी-कभी लाइव शो में मैं अपनी लिस्ट बदल भी देता हूं अगर किसी श्रोता की रिक्वेस्ट दिल को छू जाए। यही वजह है कि मुझे लगता है रेडियो कभी खत्म नहीं होगा — भले ही वो अब FM टावर से नहीं, इंटरनेट से आपके फ़ोन तक पहुंचे। जब तक लोगों को किसी इंसान की आवाज़ सुनकर ये महसूस करना है कि "कोई है जो अभी, इसी वक़्त, मेरे लिए गाना बजा रहा है" — तब तक रेडियो ज़िंदा रहेगा। अगर आप भी हमारे शो सुनते हैं, तो अगली बार मैसेज ज़रूर भेजिएगा — शायद आपका गाना अगले ही शो में बज जाए। — RJ अमन