अगर आप 90 के दशक का कोई गाना और आज 2026 का कोई गाना बारी-बारी से सुनें, तो सिर्फ धुन ही नहीं, पूरा माहौल अलग महसूस होगा। ये फ़र्क सिर्फ तकनीक का नहीं है — ये उस पूरे तरीके का है जिससे संगीत बनाया, सुना और महसूस किया जाता है। ## 90 का दशक: ऑर्केस्ट्रा और असली साज़ों का दौर 90 के दशक में जब कोई गाना बनता था, तो स्टूडियो में असली वाद्य यंत्र बजाने वाले संगीतकारों की एक पूरी टीम बैठती थी — तबला बजाने वाला अलग, सितार बजाने वाला अलग, वायलिन सेक्शन अलग। नदीम-श्रवण, जतिन-ललित, आनंद-मिलिंद जैसे संगीतकार इसी परंपरा में पले-बढ़े थे। गाने की रिकॉर्डिंग में हफ़्तों लग जाते थे, क्योंकि हर साज़ को अलग से, सही समय पर, सही भावना के साथ बजाना पड़ता था। इस दौर के गाने अक्सर मेलोडी-प्रधान होते थे — यानी धुन ही गाने की जान होती थी, बीट्स और प्रोडक्शन उतने हावी नहीं होते थे। "दीवाना" फ़िल्म से लेकर "1942: अ लव स्टोरी" तक, इस दशक में जो रूमानियत थी, वो आज भी बेमिसाल मानी जाती है। ## 2000 का दशक: डिजिटल रिकॉर्डिंग की शुरुआत नए मिलेनियम के साथ रिकॉर्डिंग तकनीक भी बदलने लगी। कंप्यूटर-आधारित रिकॉर्डिंग सिस्टम आने लगे, जिससे संगीतकारों को असली वाद्य यंत्रों के साथ-साथ सिंथेसाइज़्ड साउंड मिलाने की आज़ादी मिली। ए.आर. रहमान इस बदलाव के सबसे बड़े प्रतीक बने — उन्होंने पश्चिमी प्रोडक्शन तकनीक और भारतीय शास्त्रीय संगीत को इस तरह मिलाया जो पहले कभी नहीं हुआ था। इस दौर में प्राइवेट म्यूज़िक कंपनियां भी बड़ी होने लगीं, और सिर्फ फ़िल्मी गाने ही नहीं, इंडिपेंडेंट एल्बम भी लोकप्रिय होने लगे। हिमेश रेशमिया जैसे संगीतकार-गायकों ने अपनी अलग पहचान बनाई, भले ही उनकी शैली को लेकर बहस भी बहुत हुई। ## 2010 का दशक: सिंगल्स और डिजिटल स्ट्रीमिंग की शुरुआत यूट्यूब और बाद में स्पॉटिफ़ाई-गाना जैसे प्लेटफ़ॉर्म आने के साथ एक बड़ा बदलाव आया — अब गाने सिर्फ फ़िल्मों के लिए नहीं, बल्कि सीधे "सिंगल्स" के तौर पर भी रिलीज़ होने लगे। अरिजीत सिंह इस दौर के सबसे बड़े नाम के तौर पर उभरे — उनकी आवाज़ में जो सादगी और गहराई थी, वो एक नए तरह के रोमांटिक और उदास गीतों का दौर लेकर आई। इसी दौर में प्रोडक्शन का तरीका भी बदल गया — अब बहुत से गाने पूरी तरह लैपटॉप पर, बिना बड़े स्टूडियो या ऑर्केस्ट्रा के भी बन सकते थे। इससे नए, स्वतंत्र संगीतकारों के लिए दरवाज़े खुले, लेकिन कुछ आलोचकों का मानना है कि इससे संगीत की वो "हाथ से बनी" गुणवत्ता भी कुछ कम हुई जो 90 के दशक में थी। ## आज का दौर: छोटे, तेज़, एल्गोरिद्म-फ्रेंडली गाने आज के दौर में गानों की लंबाई भी बदल गई है — ज़्यादातर हिट गाने 3 मिनट से कम के होते हैं, क्योंकि स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म पर "स्किप रेट" मैटर करता है। गानों का पहला 15-20 सेकंड बहुत ज़्यादा अहम हो गया है, क्योंकि यही तय करता है कि श्रोता गाना पूरा सुनेगा या स्किप कर देगा। ## लिरिक्स का बदलता अंदाज़ सिर्फ धुन और प्रोडक्शन ही नहीं, गानों के बोल भी हर दशक में बदलते गए। 90 के दशक के गीतकार अक्सर शायराना, रूपकों से भरी भाषा इस्तेमाल करते थे — जैसे प्यार को किसी मौसम या किसी नज़ारे से जोड़ना। 2000 के दशक में भाषा थोड़ी सीधी होने लगी, रोज़मर्रा के शब्द गानों में आने लगे। और आज के दौर में तो हिंदी-अंग्रेज़ी का मिश्रण, और कभी-कभी सिर्फ कुछ पंक्तियों का बार-बार दोहराव भी आम हो गया है — क्योंकि छोटे, यादगार हुक (hook) लाइनें सोशल मीडिया पर वायरल होने के लिए ज़्यादा असरदार मानी जाती हैं। ## तो क्या पुराना दौर बेहतर था? ये बहस हमेशा चलती रहेगी। कुछ श्रोताओं को लगता है पुराने गानों में जो गहराई और धैर्य था, वो आज कम हो गया है। वहीं कुछ को लगता है आज के संगीतकार तकनीक का इस्तेमाल करके ऐसी चीज़ें कर पा रहे हैं जो पहले संभव ही नहीं थीं। Radio Hotstar पर हम जान-बूझकर दोनों दौर के गाने साथ बजाते हैं — क्योंकि हमें लगता है कि हर दशक का अपना जादू है, और असली संगीत-प्रेमी वो है जो हर दौर की खूबसूरती को समझे, चाहे वो 90 के दशक का ऑर्केस्ट्रा हो या आज का लैपटॉप प्रोडक्शन।