खंडवा नाम का एक छोटा सा शहर है मध्य प्रदेश में। वहीं एक लड़का पैदा हुआ था, आभास कुमार गांगुली, जिसे दुनिया बाद में किशोर कुमार के नाम से जानेगी। मज़े की बात ये है कि इस लड़के को कभी गाना सीखने की कोई बाकायदा तालीम नहीं मिली। जबकि उस दौर के ज़्यादातर बड़े गायक — मन्ना डे हों या तलत महमूद — शास्त्रीय संगीत की सालों की ट्रेनिंग से आए थे। किशोर कुमार का रास्ता बिल्कुल अलग था। उनके बड़े भाई अशोक कुमार पहले से ही फ़िल्मों में एक जाना-पहचाना नाम बन चुके थे, और यही वजह थी कि किशोर को बॉम्बे (अब मुंबई) की फ़िल्मी दुनिया में एंट्री मिली। शुरुआत में तो उन्हें कॉमेडी रोल दिए गए, गाने नहीं। लेकिन स्टूडियो में जब कभी मौका मिलता, वो कुछ न कुछ गुनगुनाते रहते थे, और धीरे-धीरे लोगों को समझ आने लगा कि इस आदमी की आवाज़ में कुछ खास बात है। बात सिर्फ आवाज़ की नहीं थी — बात थी उस आवाज़ के साथ जो आज़ादी थी। किशोर कुमार जब गाते थे, तो नियम-कायदों की परवाह नहीं करते थे। कभी बीच गाने में सीटी बजा देते, कभी योडलिंग शुरू कर देते (जो उस दौर में हिंदुस्तानी फ़िल्मों में लगभग सुना ही नहीं गया था), कभी हंसी की आवाज़ मिला देते। "मेरे सपनों की रानी" में जो हार्मोनिका के साथ उनकी सीटी सुनाई देती है, वो आज भी उतनी ही ताज़ा लगती है। आर.डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी शायद इस दौर की सबसे दिलचस्प जोड़ी थी। दोनों उम्र में इतना फ़र्क नहीं था, दोनों प्रयोग करने से डरते नहीं थे, और शायद इसीलिए "हरे रामा हरे कृष्णा" के "दम मारो दम" से लेकर "आंधी" के धीमे, संजीदा गानों तक — दोनों साथ मिलकर हर तरह का संगीत बना सकते थे। संगीतकार सिर्फ धुन नहीं देते थे किशोर कुमार को, वो जानते थे कि इस आवाज़ के साथ कुछ भी संभव है। राजेश खन्ना के रोमांटिक किरदारों की आवाज़ किशोर कुमार बने, तो अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन वाले दौर में भी उन्हीं की आवाज़ चली। ये कोई मामूली बात नहीं — दो बिल्कुल अलग तरह के हीरो, दो बिल्कुल अलग स्क्रीन पर्सनैलिटी, और बीच में एक ही आवाज़ जो दोनों पर फिट बैठती थी। "जिंदगी एक सफ़र है सुहाना" गाते वक़्त वो जितने बेफ़िक्र लगते थे, "मुसाफ़िर हूं यारों" गाते वक़्त उतने ही अकेले और खोए हुए लगते थे। एक बात जो कम ही लोग जानते हैं — किशोर कुमार को पैसों और फ़िल्मी दुनिया के दिखावे में कभी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। कहा जाता है कि वो अक्सर प्रोड्यूसरों से पहले पूरा पेमेंट मांग लेते थे, स्टूडियो में मूड न हो तो गाना टाल देते थे, और शूटिंग सेट पर भी उतने ही सनकी माने जाते थे जितने अपनी गायकी में बेबाक थे। उन्होंने ख़ुद कई फ़िल्में लिखीं, निर्देशित कीं, उनमें अभिनय भी किया — ये सब एक ऐसे दौर में जब ज़्यादातर लोग एक ही काम में उलझे रहते थे। ## एक ही दशक में इतने अलग-अलग दौर 60 के दशक में जब किशोर कुमार गायक के तौर पर अभी अपनी पहचान बना ही रहे थे, तब भी वो हल्के-फुल्के, मस्ती भरे गाने ज़्यादा गाते थे — क्योंकि उस दौर में उन्हें ज़्यादातर कॉमेडी और हल्के किरदारों के लिए बुलाया जाता था। लेकिन 70 का दशक आते-आते तस्वीर पूरी तरह बदल गई। राजेश खन्ना की फ़िल्मों की कामयाबी के साथ किशोर कुमार अचानक बॉलीवुड के सबसे मांगे जाने वाले गायक बन गए। "अराधना" फ़िल्म के गानों ने ये साबित कर दिया कि उनकी आवाज़ में वो रूमानियत भी है जो एक पूरी पीढ़ी के दिल तक पहुंच सकती है। 80 के दशक में जब बॉलीवुड में एक्शन और मेलोड्रामा का बोलबाला था, किशोर कुमार ने फिर खुद को ढाला — इस बार अमिताभ बच्चन और मिथुन चक्रवर्ती जैसे सितारों के लिए गाते हुए। यही बात उन्हें बाकी गायकों से अलग करती है — मोहम्मद रफ़ी और मुकेश जैसे दिग्गजों की अपनी अलग पहचान थी, लेकिन किशोर कुमार हर दशक में खुद को नए सिरे से गढ़ते रहे, बिना अपनी असली आवाज़ खोए। Radio Hotstar पर हमारे "Old is Gold" स्लॉट में किशोर कुमार का कोई न कोई गाना लगभग हर दिन बजता है, और श्रोताओं की तरफ़ से जो मैसेज आते हैं उनसे साफ़ पता चलता है — ये गाने सिर्फ नॉस्टैल्जिया नहीं हैं। बहुत से युवा श्रोता भी इन गानों को उतनी ही शिद्दत से सुनते हैं जितनी शिद्दत से 40-50 साल पहले सुना जाता था। शायद इसकी वजह यही है कि किशोर कुमार ने कभी किसी एक "स्टाइल" में खुद को बांधा ही नहीं — और यही आज़ादी उनकी आवाज़ को हर दौर में प्रासंगिक बनाए रखती है। अगली बार जब रेडियो पर "पल पल दिल के पास" या "ओ मेरे दिल के चैन" बजे, तो थोड़ा ध्यान से सुनिएगा — उस आवाज़ में जो सहजता है, वो सिखाई नहीं जा सकती।